बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

चक्कू रामपुरी "अहिंसक" के खस्ता बावरे दोहे - उलटबांसी

(अनुराग शर्मा)

जौहरी जौहर न करे चाची पिये न चाय
दुनिया उल्टी चल पड़ी आय जेब से जाय

एडवांस में फीस ली, डेट करी एडवांस
पैसा लेके भग लिये, काम का नक्को चांस

वोट मांगने आ गये, जोड़ रहे अब हात
पाँच बरस तक पेट पे जो मार रहे थे लात

कबिरा प्रेम है बावरा, जामे कोई न स्मार्ट
एमडी पास बता रही, है फ़ेल्ड बैचलर आर्ट

सोमवार, 30 जनवरी 2012

है दुनिया इन्हीं की ज़माना इन्हीं का

(अनुराग शर्मा)

कभी ये भी मालामाल थे
कभी इनके सर पे भी बाल थे
इन्हें आज की न मिसाल दो
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

ये मुँह तो शादी से बन्द है
पहले ये बहुत ही वाचाल थे
अब अपने आप ही क्या कहैं
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

लाजवाब और बेसवाल थे
ये ग़ज़लची चच्चा कव्वाल थे
बस इन्हींकी तूती थी बोलती
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

रिश्वत मैया के प्यारे लाल थे
पड़े काम तो करते हलाल थे
बख्शीश बिन न हिले कभी
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

शनिवार, 21 जनवरी 2012

रसोई में कुत्ता आया

भूखा कुत्ता
फिल्मों के कई गीतों में 'खस्ता' टाइप के बोल सुनाई दे जाते हैं जैसे किसी एक गाने में यह पंक्ति है - तम्बाकू नहीं है कैसे कटेगी सारी रात, बुढ़िया रोये..। प्रश्न यह है कि ऐसा साहित्यिक कृतियों में भी होता होगा? उत्तर है - हाँ।
अपनी प्रसिद्ध रचना 'वेटिंग फ़ॉर गॉडो' में सैम्युअल बैकिट एक खस्ता रचना से हमें रूबरू कराते हैं। अनुवाद है - कृष्ण बलदेव वैद का।
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रसोई में कुत्ता आया 
चुरायी सूखी रोटी।
बावर्ची ने कलछ उठाया
और कर दी बोटी बोटी!
फिर सारे कुत्ते आये
रसोई में दौड़े दौड़े 
और क़बर खोद कर उसकी
लिख दिया उसी पर यह - 
'आने वाली कुत्ती नसलों के लिये'। 
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किसी भी स्पष्टीकरण के लिये आप सैम्युअल बैकिट या कृष्ण बलदेव वैद से सम्पर्क कर सकते हैं। नेट आप के पास है- पता सता खुद ढूँढ़ लीजिये। 
हाँ, इस रचना में परिवर्द्धन के लिये आप की पंक्तियाँ आमंत्रित हैं। 


मंगलवार, 3 जनवरी 2012

2012 की खस्ता शुभकामनायें!


(चचा ग़ालिब से क्षमा याचना सहित)
हजारों ख्वाहिशें ऐसी, कि हर ख्वाहिश पर दम निकले
जहाँ पढने की बातें हों, वहाँ से बचके हम निकले
शराबी जूस भी लाये, मनाये ये कि रम निकले
मिले भुगतान जो तुमसे, गिने फिर भी वे कम निकले
लगा थैले में पैसे हैं, खुला तो फ़टते बम निकले
चचा सूरज से चमके थे, भतीजे हिम से जम निकले
[अभी का तापक्रम 10°F (शून्य से 12.22°C नीचे) है]

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

हम तो हैं परदेस में ... दीपावली शुभ हो!

居酒屋 में विनम्र विदेशियों के आतिथ्य का आनद उठा रहे मुनीश शर्मा जी ने दीवाली पर घर से बाहर होने के दुख को कुछ इस प्रकार व्यक्त किया:
माना कि है ये दीवाली घर से दूर और निपट अकेले ,
पर वो भी क्या होगा इंसां जिसने कभी न ये पापड़ बेले :)
वाह, वाह! अब आपको पता ही है कि वह मित्रता ही क्या जो अन्य मित्रों को प्रभावित न करे। और वह खस्ता शेर ही क्या जो कम से कम एक खस्ता ग़ज़ल की प्रेरणा न बने। तो साहब, पेश है यह गीत
ये पापड भी ले लो
ये बेलन भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी कढाई
मगर मुझको लौटा दो जगमग दीवाली
वो खीलें बताशे पटाखे मिठाई

ये पापड भी ले लो ...

मुहल्ले की 
लड़की वो सबसे चकानी
पहुँचे हुओं को पिला दे जो पानी
वो पानी में उसके पटाखे डुबोना
फिर आँसू से उसका मुझको भिगोना
पटाखे मेरे छीनकर फिर चलाना
वो हंसना, छकाना, औ' वो खिलखिलाना

भुला न सकूँ चूड़ी की खनखनाहट
उन आँखों की फिर से बड़ी याद आई

ये पापड भी ले लो ...
आपके मित्रों, परिजनों के साथ आपको भी पर्व की मंगलकामनायें!
तमसो मा ज्योतिर्गमय!

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

कलियुग का सत्य

(अनुराग शर्मा)

जिसकी जैसी खाज भैया
वैसा करो इलाज भैया

बत्तीस रुपै गरीबी के हैं
उन्नत हुआ समाज भैया

सच्ची बात से कन्नी काटैं,
सच करता नाराज भैया[1]

कौन कहे आजाद हुए हम
खतम हो गया "राज" भैया?[2]

रज़िया फ़ंस गयी गुन्डों में
मूल बचा न ब्याज भैया

दुश्शासन से आस लगाई
कैसे बचती लाज भैय्या

शूर्पणखा के शासन में तौ
आय चुका रामराज भैया

शनिवार, 17 सितंबर 2011

काका हाथरसी के जन्मदिन व पुण्यतिथि पर विशेष

प्रभुलाल गर्ग "काका हाथरसी"
पद्मश्री काका हाथरसी
(18 सितंबर 1906 :: 18 सितंबर 1995)

जीवन के संघर्षों के बीच हास्य की फुलझड़ियाँ जलाने वाले काका ने 1932 में हाथरस में संगीत की उन्नति के लिये गर्ग ऐंड कम्पनी की स्थापना की जिसका नाम बाद में संगीत कार्यालय हाथरस हुआ। भारतीय संगीत के सन्दर्भ में विभिन्न भाषा और लिपि में किये गये कार्यों को उन्होंने जतन से इकट्ठा करके प्रकाशित किया। उनकी लिखी पुस्तकें संगीत विद्यालयों में पाठ्य-पुस्तकों के रूप में प्रयुक्त हुईं। 1935 से संगीत कार्यालय ने मासिक पत्रिका "संगीत" का प्रकाशन भी आरम्भ किया जो कि अब तक अनवरत चल रहा है। उन्होंने हास्य कवियों के लिये काका हाथरसी पुरस्कार और संगीत के क्षेत्र में काका हाथरसी संगीत सम्मान भी आरम्भ किये।

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
हम भेड़-बकरी इसके यह ग्वारिया हमारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा

सत्ता की खुमारी में, आज़ादी सो रही है
हड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही है
लेकर के कर्ज़ खाओ यह फर्ज़ है तुम्हारा
सारे जहाँ से अच्छा .......

चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैं
ईमान के मुसाफिर राशन को तरशते हैं
वोटर से वोट लेकर वे कर गए किनारा
सारे जहाँ से अच्छा ...

जब अंतरात्मा का मिलता है हुक्म काका
तब राष्ट्रीय पूँजी पर वे डालते हैं डाका
इनकम बहुत ही कम है होता नहीं गुज़ारा
सारे जहाँ से अच्छा ...

हिन्दी के भक्त हैं हम, जनता को यह जताते
लेकिन सुपुत्र अपना कांवेंट में पढ़ाते
बन जाएगा कलक्टर देगा हमें सहारा
सारे जहाँ से अच्छा ...

फ़िल्मों पे फिदा लड़के, फैशन पे फिदा लड़की
मज़बूर मम्मी-पापा, पॉकिट में भारी कड़की
बॉबी को देखा जबसे बाबू हुए अवारा
सारे जहाँ से अच्छा ...

जेवर उड़ा के बेटा, मुम्बई को भागता है
ज़ीरो है किंतु खुद को हीरो से नापता है
स्टूडियो में घुसने पर गोरखा ने मारा
सारे जहाँ से अच्छा ...

[काका तरंग से साभार]
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* प्यार किया तो मरना क्या (ऑडिओ)
* काका हाथरसी का जन्मदिन और पुण्यतिथि (18 सितम्बर)
* काका हाथरसी की हास्य कविता