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सोमवार, 30 जनवरी 2012

है दुनिया इन्हीं की ज़माना इन्हीं का

(अनुराग शर्मा)

कभी ये भी मालामाल थे
कभी इनके सर पे भी बाल थे
इन्हें आज की न मिसाल दो
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

ये मुँह तो शादी से बन्द है
पहले ये बहुत ही वाचाल थे
अब अपने आप ही क्या कहैं
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

लाजवाब और बेसवाल थे
ये ग़ज़लची चच्चा कव्वाल थे
बस इन्हींकी तूती थी बोलती
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

रिश्वत मैया के प्यारे लाल थे
पड़े काम तो करते हलाल थे
बख्शीश बिन न हिले कभी
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

यूँ भी तो हो - एक इच्छा - एक कविता

काजू सड़ते शराब हो जाते
गदहे सज के नवाब हो जाते

पानी खेतों में पड़ गया होता
गेंहूँ खिल के गुलाब हो जाते

हमें साफा व सूट फिट आता
खुद ही कटके कबाब हो जाते

इश्क़ में सर नहीं गंवाते हम
तेरे दिल की किताब हो जाते

ढूंढते आप पर न मिलता मैं
पल में सारे हिसाब हो जाते

.-=<>=-.

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

जीवन की राहें - एक खस्ता पैरोडी

पाठकों की बेहद मांग का आदर करते हुए एक बासी कचौड़ी उबालकर प्रस्तुत है

आलू भरी वो, कचौडी बनाएं
ख़ुद भी खाएं, हमें भी खिलाएं
आलू भरी वो...

भरवां करेले नहीं माँगता हूँ
पूरी औ' छोले नहीं माँगता हूँ
पत्तों की चटनी बनाकर वो लायें
ख़ुद भी चाटें, हमें भी चटायें
आलू भरी वो...

कैसे बताऊँ मैं भूखा नहीं
खा लूंगा मैं रूखा सूखा सही
मुझको न थाली सुनहरी दिखाएँ
ख़ुद भी खाएं, हमें भी खिलाएं
आलू भरी वो...

अरे पता है कि चित्र में कचौडी नहीं परांठा है - जभी तो कचौडी की तमन्ना है

आपके खस्ता शेरों का स्वागत है - शर्त इतनी है कि शेर आपके अपने हों - और अगर औटो या ट्रक वाले के हैं तो ट्रैफिक पुलिस का अनुमतिपत्र साथ में नत्थी हो। 
धन्यवाद!
[चाय का प्याला और आलू परांठा का चित्र - अनुराग शर्मा द्वारा :: The tea mug and aloo parantha photograph by Anurag Sharma]