तुकबन्दी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तुकबन्दी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 30 जनवरी 2012

है दुनिया इन्हीं की ज़माना इन्हीं का

(अनुराग शर्मा)

कभी ये भी मालामाल थे
कभी इनके सर पे भी बाल थे
इन्हें आज की न मिसाल दो
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

ये मुँह तो शादी से बन्द है
पहले ये बहुत ही वाचाल थे
अब अपने आप ही क्या कहैं
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

लाजवाब और बेसवाल थे
ये ग़ज़लची चच्चा कव्वाल थे
बस इन्हींकी तूती थी बोलती
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

रिश्वत मैया के प्यारे लाल थे
पड़े काम तो करते हलाल थे
बख्शीश बिन न हिले कभी
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

हम तो हैं परदेस में ... दीपावली शुभ हो!

居酒屋 में विनम्र विदेशियों के आतिथ्य का आनद उठा रहे मुनीश शर्मा जी ने दीवाली पर घर से बाहर होने के दुख को कुछ इस प्रकार व्यक्त किया:
माना कि है ये दीवाली घर से दूर और निपट अकेले ,
पर वो भी क्या होगा इंसां जिसने कभी न ये पापड़ बेले :)
वाह, वाह! अब आपको पता ही है कि वह मित्रता ही क्या जो अन्य मित्रों को प्रभावित न करे। और वह खस्ता शेर ही क्या जो कम से कम एक खस्ता ग़ज़ल की प्रेरणा न बने। तो साहब, पेश है यह गीत
ये पापड भी ले लो
ये बेलन भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी कढाई
मगर मुझको लौटा दो जगमग दीवाली
वो खीलें बताशे पटाखे मिठाई

ये पापड भी ले लो ...

मुहल्ले की 
लड़की वो सबसे चकानी
पहुँचे हुओं को पिला दे जो पानी
वो पानी में उसके पटाखे डुबोना
फिर आँसू से उसका मुझको भिगोना
पटाखे मेरे छीनकर फिर चलाना
वो हंसना, छकाना, औ' वो खिलखिलाना

भुला न सकूँ चूड़ी की खनखनाहट
उन आँखों की फिर से बड़ी याद आई

ये पापड भी ले लो ...
आपके मित्रों, परिजनों के साथ आपको भी पर्व की मंगलकामनायें!
तमसो मा ज्योतिर्गमय!

सोमवार, 31 जनवरी 2011

चमडी ज़रा मोटी है प्यारे

"पढें फारसी बेचे तेल" के अनुसरणकर्ताओं से क्षमायाचना सहित ... एक प्रयास

गुड तेल बेचते हैं पढी फारसी नहीं
आरामतलब हैं ये मगर आलसी नहीं

ये प्यासे मर रहे हैं ज़रा आब दिखाओ
खुद उठ के ले सकें इनकी पॉलसी नहीं

बोले बला का फिर भी असरदार न हुए
चमडी ज़रा कडी है नर्म खाल सी नहीं

शीश सलामत है ज़ुबां कट के न गिरी
दुश्मन सुधर रहे हैं कोई चाल सी नहीं