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सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं - 2

सनातन कालयात्री के ओरिजिनल शेर:

है अपने दिल का अकाउंट बहुत महफूज
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं!

पर आधारित "बस उनकी आँखें" का भाग एक आपने कुछ दिन पहले पढ़ा था। अब प्रस्तुत है भाग दो। शायरी अपने मेजर साब श्री गौतम राजरिशी जी की है

बड़े बड़ों के पर वे रोज़ कतरती हैं
मेरे कमेन्ट से मैडम लेकिन डरती हैं

एफबी पर तो रहती हैं दिन-रात डटी
चाइटिंग से जाने क्यूँ, हाय मुकरती हैं

उनके बस इक हेलो पर दीवानों की
सौ दो सौ स्माइलियाँ आहें भरती हैं

अपने दिल की आईडी तो है सेफ मगर
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं

(गौतम राजरिशी)

रविवार, 29 दिसंबर 2013

बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं

"खस्ता शेर" के ढाबे पे आके सनातन कालयात्री जी कहने लगे कि हमारे शेर को तल के खस्ता कर दो। हमने कहा, ज़रा दिखाये तो उन्ने  दिखाया। हम तो शेर देखते ही समझ गए कि अंगीठी के बस का न है ये शेर, इसके लिए तो भट्टी चढ़ानी पड़ेगी। हमने कहा कि हम अंदर से निकाल के एक गजल अभी-हाल पका देते हैं, खस्ता और कुरकुरी। पहले तो उन्ने थोड़ी नानुकर की लेकिन जब लगा कि भट्टी चढ़ाने में काफी देर लग जाएगी तो मान गए। तो ये तो था उनका ओरिजिनल शेर:
   
है अपने दिल का अकाउंट बहुत महफूज
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं!

और ये है फाइनल खस्ता गजल। अच्छी तरह चबा-चबा के पढ़िये:  

दिल का है मेरे खाता, चौकस रखवाली है
छूट उनको मिली है हर द्वार की ताली है॥

वे नज़रें मिलाते हैं, सीटी हो बजी जैसे
रेले-दिल छूटी है, टेसन हुआ खाली है॥

ख्वाबों में रहा करते, आँखों में बसे हैं वे
हर दिन है दशहरा औ' हर रात दिवाली है॥

ये आँख नहीं खुलती, मैं कैसे नशे में हूँ
भीगे हैं तेरे गेसू, मदिरा की प्याली है॥

दैवी है वो मुखड़ा, सूरज सा दमकता है
ध्रुवपद हुए जाते वे, जो गाते कव्वाली हैं॥

दिल जान हुए तेरे, अब मेरा नहीं कोई
अनुरागी हो "बैरागी", ये रीत निराली है॥

(अनुराग शर्मा)

शनिवार, 15 जून 2013

बेमेल विवाह - खस्ता कुंडली


मुँह में आँत न पेट में दाँत, चले ब्याह रचाने
कुछ ही गज पर खड़े हुए यमदूत लिवाने
दिन कम हैं घर बसाता हो जाए न लेट
चौथी शादी करे है विधुर नगर का सेठ

नगर का सेठ, ब्याह में जुटे हजारों लोग
पॉपधुनों पर नाचते छकते छप्पन भोग

छकते छप्पन भोग चकित हैं नर नारी
बूढ़े संग जीवन काटेगी कमसिन बेचारी

बेचारी के दुख से द्रवित हुए संपादक
इंटरव्यू करने चले बनकर ये याचक

याचक जी पूछन लगे वधू पक्ष के तीर
ताऊ पे दिल आ गया क्या तेरी तक़दीर

तक़दीरों की बात पे चहकी भोली बाला
घूँघट से बाहर आकर स्टेटमेंट दे डाला

डाला पत्थर ताल,  बवंडर करती वायु
बुद्धिमती वर देखती, नहीं देखती आयु

आयु से क्या लाभ, काम आती है इन्कम
ऊपर से बस ...  इत्ते हैं इनके दिन कम

(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा)

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

चक्कू रामपुरी "अहिंसक" के देहाती दोहे


भारत हमको जान से प्यारा है ...
कुत्ते दुई परकार के सुनौ ध्यान से संत
चाट-चाट बेदम करैं या काट-काट कै अंत

आज़ाद हिन्द की आस में वीर हुए कुर्बान
ठग आजादी चर गए माल बाप का जान

नेताजी बस इक भए बोस सुभाष बलवीर
अब कायर नेता हो लिए, मारे कद्दू में तीर

चीनी पिकनिक कर रहे लद्दाखी हैं तंग
कोयला मंत्री खा गए रक्षा मंत्री मलंग

भोगी द्वीप खरीदते काले धन का ढेर
जनता के दिन न फिरे हुई  सबेर पै देर

फ़त्ते बोझा सर धरे, पहुँचेंगे उस पार
ढोते-ढोते न थकें, सो चट्ट गये अचार!

मंगलवार, 12 जून 2012

चक्कू रामपुरी "अहिंसक" के सर्वश्रेष्ठ खस्ता दोहे

(चित्र व दोहे: अनुराग शर्मा)


तुकमारिया खायें, खस्ता शेर बनायें, पुरस्कार पायें
बे बाँटैं तौ रेवड़ी, हम कर दें तौ खून
बे तौ मालामाल हैं, हम तरसैं दो जून

आइस पाइस टीप के, बने टिप्पणी वीर
दाने पाँच न बो सकैं, फिर भी खाबैं खीर

छुरी बगल मैं दाब के, झूठा कर गुनगान
ईटा सर पे मारता, मुख पर है मुस्कान

सच्चा सेवक बन रहा, रहा झूठ की खान
रेवड़ी बोतल बाँट के,  बन जइहै परधान

भालो उसको देख कै, सरक लये हैं लोग
भोले पर जा बरसते, है कैसो जा संजोग

बिल्ली उसको जानिये, मन में जो मुस्काय
छिप-छिप पंजा मार के, माल मलाई खाय

ऊँचा भया तौ का भया, ज्यूँ टावर मोबाइल
सिगनल इतना वीक है, कछहुँ नहीं सुनाइल






गुरुवार, 24 मई 2012

टांग चबाते रहिये

(चित्र व दोहे: अनुराग शर्मा)


जापान से स्वर्णजटित मिष्ठान्न
अंटी में नामा भरा अपनी सुनाते रहिये
माल जो मुफ्त मिले जम के उड़ाते रहिये

नज़्र चूके औ वो सामने पड़ जायें तौ
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये*

हूट करता हो जहाँ, बोर न समझें खुद को
टोके जग सारा तो भी अपनी बताते रहिये

जो कही खूब कही अब तो निकल ले शायर
रात भर शेर सुने सामयीन सताते रहिये

रूप गुण काम नहीं आते हैं इस दुनिया में
सौदागर फूस के हैं स्वर्ण छिपाते रहिये
-----------
* एक प्रसिद्ध शायर की शब्दावली से साभार

शनिवार, 24 मार्च 2012

किसने क्या किया?

किसी ने नाम दिया
किसी ने दाम लिया
गिरने लगे जब भी
किसी ने थाम लिया
(~ अनुराग शर्मा)

बुधवार, 7 मार्च 2012

होलिका के सपने

बरेली के एक शिक्षक कवि श्री ग्रिन्दलाल जी ने आपात्काल पर एक गीत रचा था, "कैसे झूलें रानी, खिसक गया पटरा।" होलिकादहन की रात्रि पर जलते हुए पटरे देखकर उनके शब्द याद आ गये और साथ ही याद आया होलिका मैया का आत्मविश्वास। कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:

होलिका दहन की तैयारी
कुँवरि चुटैल हैं अब झूल न सकेंगी
और कोई झूलै तो पटरा खींच लेंगी

जीतने का दम नहीं हार उनकी तय है
चीख-चीख आकाश सिर पे ले धरेंगी

आग दिल में है नहीं आँच कैसे होगी
प्रह्लाद मरे कैसे धुआँधार ही करेंगी

अपनों में दोष कभी दानव न देखते
पाप खुद करें आरोप भक्त पे मढेंगी

भाई का राज कई बकरे सजातीं रोज़
रक्तपान में आनन्द क़ुर्बान वे करेंगी

होलिका के दर्शन को बौराये मत घूमो
इस जहाँ में अब कभी पग नहीं धरेंगी

असुरों के खानदान का अंत दूर नहीं
प्रह्लाद मार रहीं जल के खुद मरेंगी॥ 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

चक्कू रामपुरी "अहिंसक" के खस्ता बावरे दोहे - उलटबांसी

(अनुराग शर्मा)

जौहरी जौहर न करे चाची पिये न चाय
दुनिया उल्टी चल पड़ी आय जेब से जाय

एडवांस में फीस ली, डेट करी एडवांस
पैसा लेके भग लिये, काम का नक्को चांस

वोट मांगने आ गये, जोड़ रहे अब हात
पाँच बरस तक पेट पे जो मार रहे थे लात

कबिरा प्रेम है बावरा, जामे कोई न स्मार्ट
एमडी पास बता रही, है फ़ेल्ड बैचलर आर्ट

सोमवार, 30 जनवरी 2012

है दुनिया इन्हीं की ज़माना इन्हीं का

(अनुराग शर्मा)

कभी ये भी मालामाल थे
कभी इनके सर पे भी बाल थे
इन्हें आज की न मिसाल दो
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

ये मुँह तो शादी से बन्द है
पहले ये बहुत ही वाचाल थे
अब अपने आप ही क्या कहैं
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

लाजवाब और बेसवाल थे
ये ग़ज़लची चच्चा कव्वाल थे
बस इन्हींकी तूती थी बोलती
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

रिश्वत मैया के प्यारे लाल थे
पड़े काम तो करते हलाल थे
बख्शीश बिन न हिले कभी
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

यूँ भी तो हो - एक इच्छा - एक कविता

काजू सड़ते शराब हो जाते
गदहे सज के नवाब हो जाते

पानी खेतों में पड़ गया होता
गेंहूँ खिल के गुलाब हो जाते

हमें साफा व सूट फिट आता
खुद ही कटके कबाब हो जाते

इश्क़ में सर नहीं गंवाते हम
तेरे दिल की किताब हो जाते

ढूंढते आप पर न मिलता मैं
पल में सारे हिसाब हो जाते

.-=<>=-.

मंगलवार, 15 मार्च 2011

भंग की तरंग में कुछ पंक्तियाँ


कुछ गाने को दिल करता है, सुना लूँ?
तालियाँ बजाओगे या रामपुरी निकालूँ?

दिल के बहाने कहीं ले न उडें चुप के
ज़रा सा रुक जाओ, बटुआ छिपा लूँ

जिनकी होनी थी उन सबकी हो ली
मस्ती में मैं भी तो रंग में नहा लूँ

लाज की लाली से लाल हो रहे हैं जो
उन गालों से थोडा सा रंग चुरा लूँ?

बुरा न मानो होली है!

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

वीर तुम ...धीर तुम

वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम रचे चलो !

हाथ में कलम रहे नेट खुशफहम रहे
तू कभी रुके नहीं सत्तू कभी मुके नहीं
वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम रचे चलो !

सामने पहाड़ हो शेरनी दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम रचे चलो !

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम रचे चलो !

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए
ब्लॉगभूमि के लिये, दही दिमाग के लिये
वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम रचे चलो !

अन्न गृह में भरा वारि नल में भरा
बरतन खुद निकाल लो खाना खुद बना लो
वीर तुम लिखे चलो ! धीर तुम रचे चलो !


शनिवार, 4 सितंबर 2010

थकी हुई शायरी - तड़पते अश'आर

साहेबान, मेहरबान, पहलवान, खानदान, मसालदान,

अगर आपको दरकार है आला दर्ज़े की शायरी की तो चलते फिरते नज़र आइये क्योंकि उस किताबी शायरी की दुकान तो हमने बढा दी है (वरना बाकी शायर भूखे मर जाते न भई!)

हाँ अगर हल्की फुल्की चल्ताऊ, ऑटो रिक्शा छाप शायरी सुनने की इच्छा है, तो बिल्कुल सही ठिये पर आये हैं आप।

शायरी सुनाऊंगा ऐसी धांसू ।
कि सुनके आ जायेंगे आंसू॥

और हाँ, एक बात समझ लें आप, पहले से बताये दे रहा हूँ, कहीं बाद में शिकवा शिकायत कन्ने बैठ जायें, हाँ नईं तो! हियाँ कोई जोक-वोक नहीं सुनाया जायेगा, अलबत्ता चरपरे चुटकुलों की बात अगल्ल है, वो चलेंगे, अरे दौडेंगे भई दौडेंगे।

अगर आपको भी ऑटो रिक्शा में बिला मीटर ठगे जाते वखत कोई धांसू शेर पढने का मौका मिलता है तो हमारे साथ ज़रूर बांटिये।

तो तैयार हो जाइये कफन बांध के कि हम आज की मजलिस की शम्मा का आगाज़ करते हैं:

हम थे जिनके सहारे...
हम थे जिनके सहारे...

हमारे खोम्चे में सभी कुछ है - खस्ता शेर, कागज़ी गोलगप्पे, और किताबी पानीपूरी

अरे अब नीचे इसकिरोल भी करो न, आगे का कलाम सुन्ना नईं है क्या?

हम थे जिनके सहारे
उन्ने जूते उतारे...
और सर पे दे मारे
क्या करें हम बिचारे
हम थे जिनके सहारे...

दर्द किससे कहें हम
दर्द कैसे सहें हम
दर्द में क्यों रहें हम
दर्द से कौन उबारे...

हम थे जिनके सहारे...
उन्ने जूते उतारे...
और सर पे दे मारे
क्या करें हम बिचारे
हम थे जिनके सहारे...



अगली कडी तक के लिये खुदा हाफिज़! फिर मिलेंगे, गुड बाय, टाटा, हॉर्न प्लीज़!

[चित्र अनुराग शर्मा द्वारा :: Photo by Anurag Sharma]