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सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

दोस्ती पर खस्ता दोहावली + राजनीति पर शेर

उस्ताद चक्कू रामपुरी 'अहिंसक'

अपनी अपनी दोस्ती, अपने अपने पीर
कोई हल्का रह गया कोई हुआ गम्भीर

जब तक हम चुप्पा रहे, दे गए चोट पे चोट
छिपके हम भी कट लिये न सहें खोट पे खोट

जो जो जिसके भाग में, पावै सो सो सोय 
चेरो आगे बढ़ गयो, क्यों गुर नाहक रोय

जब था फैलाना रायता तो धर दिया मिष्टी दही 
आप जैसे 'परग्रही*' अभियान में शामिल नहीं॥

खाट खड़ी तब जानिये, जब बंदा भू परि जाय
खीर पकी तब जानिये जब मुँह मीठा हो जाय

हमको पका सकें जो, वे हमें जोड़ते नहीं 
जो बच गये भोले, उन्हें हम छोड़ते नहीं

लिंक मांगकर खुश किये लिंक विज़िट करी नाहिं
रहिमन ऐसे मित्र को, कभी ब्लॉग दिखावत नाहिं

अब एक शेर दिल्ली शहर के राष्ट्रसंघ सम्राट के सम्मान में
खाँसियों का बड़ा सहारा है,
फाँसियों ने तो सिर्फ़ मारा है


*परग्रही = एलियन

मंगलवार, 21 मार्च 2017

खस्ता ग़ज़ल (३+२=५)

कटे किनारे कई भँवर मझधार मिले।  
पानी में सब डूबते भँइसवार मिले॥ (गिरिजेश राव)

घर तो छूटा ही बस्ती भी छूट गई, 
लवमैरिज में ऐसे रिश्तेदार मिले। (अनुराग शर्मा)   

बना स्कीम भागा कन्हैया फाँसी से,  
खुदकुशी पोस्टपोन बाहर इनार मिले। (गिरिजेश राव) 

रहम की मांग रहा था भीख जिनसे वो, 
हाकिम सभी जालिम व अनुदार मिले। (अनुराग शर्मा) 

चलता रहा आँख मीचे ऊँट क्षितिज तक,  
साँझ खोली पहाड़ों के अन्हार मिले। (गिरिजेश राव)  

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं - 2

सनातन कालयात्री के ओरिजिनल शेर:

है अपने दिल का अकाउंट बहुत महफूज
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं!

पर आधारित "बस उनकी आँखें" का भाग एक आपने कुछ दिन पहले पढ़ा था। अब प्रस्तुत है भाग दो। शायरी अपने मेजर साब श्री गौतम राजरिशी जी की है

बड़े बड़ों के पर वे रोज़ कतरती हैं
मेरे कमेन्ट से मैडम लेकिन डरती हैं

एफबी पर तो रहती हैं दिन-रात डटी
चाइटिंग से जाने क्यूँ, हाय मुकरती हैं

उनके बस इक हेलो पर दीवानों की
सौ दो सौ स्माइलियाँ आहें भरती हैं

अपने दिल की आईडी तो है सेफ मगर
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं

(गौतम राजरिशी)

रविवार, 29 दिसंबर 2013

बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं

"खस्ता शेर" के ढाबे पे आके सनातन कालयात्री जी कहने लगे कि हमारे शेर को तल के खस्ता कर दो। हमने कहा, ज़रा दिखाये तो उन्ने  दिखाया। हम तो शेर देखते ही समझ गए कि अंगीठी के बस का न है ये शेर, इसके लिए तो भट्टी चढ़ानी पड़ेगी। हमने कहा कि हम अंदर से निकाल के एक गजल अभी-हाल पका देते हैं, खस्ता और कुरकुरी। पहले तो उन्ने थोड़ी नानुकर की लेकिन जब लगा कि भट्टी चढ़ाने में काफी देर लग जाएगी तो मान गए। तो ये तो था उनका ओरिजिनल शेर:
   
है अपने दिल का अकाउंट बहुत महफूज
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं!

और ये है फाइनल खस्ता गजल। अच्छी तरह चबा-चबा के पढ़िये:  

दिल का है मेरे खाता, चौकस रखवाली है
छूट उनको मिली है हर द्वार की ताली है॥

वे नज़रें मिलाते हैं, सीटी हो बजी जैसे
रेले-दिल छूटी है, टेसन हुआ खाली है॥

ख्वाबों में रहा करते, आँखों में बसे हैं वे
हर दिन है दशहरा औ' हर रात दिवाली है॥

ये आँख नहीं खुलती, मैं कैसे नशे में हूँ
भीगे हैं तेरे गेसू, मदिरा की प्याली है॥

दैवी है वो मुखड़ा, सूरज सा दमकता है
ध्रुवपद हुए जाते वे, जो गाते कव्वाली हैं॥

दिल जान हुए तेरे, अब मेरा नहीं कोई
अनुरागी हो "बैरागी", ये रीत निराली है॥

(अनुराग शर्मा)

शनिवार, 15 जून 2013

बेमेल विवाह - खस्ता कुंडली


मुँह में आँत न पेट में दाँत, चले ब्याह रचाने
कुछ ही गज पर खड़े हुए यमदूत लिवाने
दिन कम हैं घर बसाता हो जाए न लेट
चौथी शादी करे है विधुर नगर का सेठ

नगर का सेठ, ब्याह में जुटे हजारों लोग
पॉपधुनों पर नाचते छकते छप्पन भोग

छकते छप्पन भोग चकित हैं नर नारी
बूढ़े संग जीवन काटेगी कमसिन बेचारी

बेचारी के दुख से द्रवित हुए संपादक
इंटरव्यू करने चले बनकर ये याचक

याचक जी पूछन लगे वधू पक्ष के तीर
ताऊ पे दिल आ गया क्या तेरी तक़दीर

तक़दीरों की बात पे चहकी भोली बाला
घूँघट से बाहर आकर स्टेटमेंट दे डाला

डाला पत्थर ताल,  बवंडर करती वायु
बुद्धिमती वर देखती, नहीं देखती आयु

आयु से क्या लाभ, काम आती है इन्कम
ऊपर से बस ...  इत्ते हैं इनके दिन कम

(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा)

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

फ़्रेंड - फेसबुकी कुंडली

फेसबुक अनुपलब्ध पृष्ठ
सारा दिन जो ज्ञान को बाँट रहे थे फ़्रेंड
हमने थोड़ा लौटाया तो यारी का दी एंड

यारी का दी एंड मिटाया नाम हमारा
हाथ झाड़ के हमसे उन्ने किया किनारा

किया किनारा चैन बड़ा है उनके बिन
खाली-पीली वाल पोतते थे सारा दिन

[वैधानिक सूचना: फेसबुक शब्द पर ख़स्ता शेर का कोई कॉपीराइट नहीं है।]

शनिवार, 24 मार्च 2012

किसने क्या किया?

किसी ने नाम दिया
किसी ने दाम लिया
गिरने लगे जब भी
किसी ने थाम लिया
(~ अनुराग शर्मा)

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

चक्कू रामपुरी "अहिंसक" के खस्ता बावरे दोहे - उलटबांसी

(अनुराग शर्मा)

जौहरी जौहर न करे चाची पिये न चाय
दुनिया उल्टी चल पड़ी आय जेब से जाय

एडवांस में फीस ली, डेट करी एडवांस
पैसा लेके भग लिये, काम का नक्को चांस

वोट मांगने आ गये, जोड़ रहे अब हात
पाँच बरस तक पेट पे जो मार रहे थे लात

कबिरा प्रेम है बावरा, जामे कोई न स्मार्ट
एमडी पास बता रही, है फ़ेल्ड बैचलर आर्ट

शनिवार, 20 अगस्त 2011

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

(शीर्षक हरिशंकर परसाई की एक कृति से साभार)

समय चला पर चले नहीं हम
कम्प हुआ पर हिले नहीं हम

प्याज़ के छिलके छील रहे हैं
रहते छिपकर मिले नहीं हम

हिमयुग आते जाते रहते
बर्फ़ गली पर गले नहीं हम

रिश्वत, लेते हैं तो देते भी हैं
फिर भी कहते भले नहीं हम

अनशन धरने बहुत हुए पर
कितना टाला, टले नहीं हम

(अनुराग शर्मा)

हिंदिओं में बू रहेगी जब तलक ईमान की।
तख्त ए लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।।
~बहादुर शाह ज़फर (1775-1862)