(शीर्षक हरिशंकर परसाई की एक कृति से साभार)
समय चला पर चले नहीं हम
कम्प हुआ पर हिले नहीं हम
प्याज़ के छिलके छील रहे हैं
रहते छिपकर मिले नहीं हम
हिमयुग आते जाते रहते
बर्फ़ गली पर गले नहीं हम
रिश्वत, लेते हैं तो देते भी हैं
फिर भी कहते भले नहीं हम
अनशन धरने बहुत हुए पर
कितना टाला, टले नहीं हम
(अनुराग शर्मा)
हिंदिओं में बू रहेगी जब तलक ईमान की।
तख्त ए लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।।
~बहादुर शाह ज़फर (1775-1862)