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बुधवार, 7 मार्च 2012

होलिका के सपने

बरेली के एक शिक्षक कवि श्री ग्रिन्दलाल जी ने आपात्काल पर एक गीत रचा था, "कैसे झूलें रानी, खिसक गया पटरा।" होलिकादहन की रात्रि पर जलते हुए पटरे देखकर उनके शब्द याद आ गये और साथ ही याद आया होलिका मैया का आत्मविश्वास। कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:

होलिका दहन की तैयारी
कुँवरि चुटैल हैं अब झूल न सकेंगी
और कोई झूलै तो पटरा खींच लेंगी

जीतने का दम नहीं हार उनकी तय है
चीख-चीख आकाश सिर पे ले धरेंगी

आग दिल में है नहीं आँच कैसे होगी
प्रह्लाद मरे कैसे धुआँधार ही करेंगी

अपनों में दोष कभी दानव न देखते
पाप खुद करें आरोप भक्त पे मढेंगी

भाई का राज कई बकरे सजातीं रोज़
रक्तपान में आनन्द क़ुर्बान वे करेंगी

होलिका के दर्शन को बौराये मत घूमो
इस जहाँ में अब कभी पग नहीं धरेंगी

असुरों के खानदान का अंत दूर नहीं
प्रह्लाद मार रहीं जल के खुद मरेंगी॥ 

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

कलियुग का सत्य

(अनुराग शर्मा)

जिसकी जैसी खाज भैया
वैसा करो इलाज भैया

बत्तीस रुपै गरीबी के हैं
उन्नत हुआ समाज भैया

सच्ची बात से कन्नी काटैं,
सच करता नाराज भैया[1]

कौन कहे आजाद हुए हम
खतम हो गया "राज" भैया?[2]

रज़िया फ़ंस गयी गुन्डों में
मूल बचा न ब्याज भैया

दुश्शासन से आस लगाई
कैसे बचती लाज भैय्या

शूर्पणखा के शासन में तौ
आय चुका रामराज भैया