(अनुराग शर्मा)
जिसकी जैसी खाज भैया
वैसा करो इलाज भैया
बत्तीस रुपै गरीबी के हैं
उन्नत हुआ समाज भैया
सच्ची बात से कन्नी काटैं,
सच करता नाराज भैया[1]
कौन कहे आजाद हुए हम
खतम हो गया "राज" भैया?[2]
रज़िया फ़ंस गयी गुन्डों में
मूल बचा न ब्याज भैया
दुश्शासन से आस लगाई
कैसे बचती लाज भैय्या
शूर्पणखा के शासन में तौ
आय चुका रामराज भैया