शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013
रविवार, 3 मार्च 2013
छोड़िये यह इधर उधर का गिला हुजूर
खाने की बात है वही जायका हो जाये
पान की तमीज थूकना शहर का हो जाये।
जुकाम है संगीन उनकी नाक आबदार है
पोंछ कर मिलाना हाथ कहर सा हो जाये।
आती है नफासत मूली के पराठों के बाद
देख आसपास उठा जरा जहर सा हो जाये।
इस अंजुमन सारे लीदर लीडर बने बैठे हैं
करें ढंग से तो इंसाँ सुलभ का हो जाये।
छोड़िये यह इधर उधर का गिला हुजूर
पते की बात है बस कोई घर का हो जाये।
रविवार, 14 अक्टूबर 2012
खस्ता गज़ल - आहिस्ता आहिस्ता
लटकते जाये हैं गुले गाल आहिस्ता आहिस्ता
सफेदी चरने लगी डाई खिजाब आहिस्ता आहिस्ता।
बुढ़ाने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा
झुर्रियाँ आईं चकाचक, टुटे दाँत आहिस्ता आहिस्ता।
अब के पैरों को सलामत मत दबाना जोर से
उंगलियाँ चटकें तुम्हारी, मैं कहूँ आहिस्ता आहिस्ता।
उनसे मिलने की तड़प में हम जो जागे रात भर
खाँसियाँ बढ़ती गईं, फूली साँस आहिस्ता आहिस्ता।
पहले उनके बुलाने से तैयार होते थे तुरत
रंग में देरी बहुत चढ़े खिजाब आहिस्ता-आहिस्ता।
अब के सावन में वो झूले ना पड़ेंगे डार पर
हड्डियाँ तड़क चुकीं, कमर कमान आहिस्ता आहिस्ता।
सफेदी चरने लगी डाई खिजाब आहिस्ता आहिस्ता।
बुढ़ाने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा
झुर्रियाँ आईं चकाचक, टुटे दाँत आहिस्ता आहिस्ता।
अब के पैरों को सलामत मत दबाना जोर से
उंगलियाँ चटकें तुम्हारी, मैं कहूँ आहिस्ता आहिस्ता।
उनसे मिलने की तड़प में हम जो जागे रात भर
खाँसियाँ बढ़ती गईं, फूली साँस आहिस्ता आहिस्ता।
पहले उनके बुलाने से तैयार होते थे तुरत
रंग में देरी बहुत चढ़े खिजाब आहिस्ता-आहिस्ता।
अब के सावन में वो झूले ना पड़ेंगे डार पर
हड्डियाँ तड़क चुकीं, कमर कमान आहिस्ता आहिस्ता।
पहले वे जो पकातीं खा जाते थे गपक
लपलपी अब जीभ ढूंढ़े है बत्तीसी आहिस्ता आहिस्ता।
लपलपी अब जीभ ढूंढ़े है बत्तीसी आहिस्ता आहिस्ता।
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(नकलनवीश वस्तादों से क्षमा। मीटर ले कर नापने वाले अपना रास्ता नापें या तवक्कुफ, तरबाना, सरबाना तफलीब-ए-तरन्नुम में खुदे कर के पर्ह लें)
सोमवार, 30 जुलाई 2012
हम क्या हैं?
| खिड़की पर ओर्किड |
कभी काग़ज़ी बादाम हैं
कभी ये टपके आम हैं
तारीफ़ अपनी क्या करें
जो आदमी गुमनाम हैं
कभी ये बिगड़ा काम हैं
कभी छलकता जाम हैं
कैसे मियाँ मिट्ठू बनें
जो आदमी बदनाम हैं
रक़ीबों का पयाम हैं
सुबह न गुज़री शाम हैं
अपने मुँह से क्या कहें
जो हर तरफ़ नाकाम हैं
गुरुवार, 12 जुलाई 2012
फेसबुक, त्रिकालजयी कविता और मूर्धन्य विश्लेषण
फेसबुक पर केवल फालतू बकबक नहीं होती, त्रिकालजयी काव्य का भी सृजन होता है। उसकी व्याख्यायें और विमर्शादि भी घटित होते हैं। एक नमूना:
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चाहे जो कहिये, हिन्दी ब्लॉग जगत को देख कर तो यही लगता है कि कविताओं में महारत स्त्रियों को ही हासिल है। ऐसे ऐसे दिग्गज विद्वान साष्टांग टिप्पणियों और चर्चाओं में लगे होते हैं कि मुझे अपनी समझ पर भारी शंका होने लगती है। पिछले सप्ताह से तो मैं मान बैठा हूँ कि मुझे कविताओं की समझ ही नहीं है।
लेबल:
त्रिकालजयी कविता,
फेसबुक,
बकबक
मंगलवार, 12 जून 2012
चक्कू रामपुरी "अहिंसक" के सर्वश्रेष्ठ खस्ता दोहे
(चित्र व दोहे: अनुराग शर्मा)
बे बाँटैं तौ रेवड़ी, हम कर दें तौ खून
बे तौ मालामाल हैं, हम तरसैं दो जून
आइस पाइस टीप के, बने टिप्पणी वीर
दाने पाँच न बो सकैं, फिर भी खाबैं खीर
छुरी बगल मैं दाब के, झूठा कर गुनगान
ईटा सर पे मारता, मुख पर है मुस्कान
सच्चा सेवक बन रहा, रहा झूठ की खान
रेवड़ी बोतल बाँट के, बन जइहै परधान
भालो उसको देख कै, सरक लये हैं लोग
भोले पर जा बरसते, है कैसो जा संजोग
बिल्ली उसको जानिये, मन में जो मुस्काय
छिप-छिप पंजा मार के, माल मलाई खाय
ऊँचा भया तौ का भया, ज्यूँ टावर मोबाइल
सिगनल इतना वीक है, कछहुँ नहीं सुनाइल
![]() |
| तुकमारिया खायें, खस्ता शेर बनायें, पुरस्कार पायें |
बे तौ मालामाल हैं, हम तरसैं दो जून
आइस पाइस टीप के, बने टिप्पणी वीर
दाने पाँच न बो सकैं, फिर भी खाबैं खीर
छुरी बगल मैं दाब के, झूठा कर गुनगान
ईटा सर पे मारता, मुख पर है मुस्कान
सच्चा सेवक बन रहा, रहा झूठ की खान
रेवड़ी बोतल बाँट के, बन जइहै परधान
भालो उसको देख कै, सरक लये हैं लोग
भोले पर जा बरसते, है कैसो जा संजोग
बिल्ली उसको जानिये, मन में जो मुस्काय
छिप-छिप पंजा मार के, माल मलाई खाय
ऊँचा भया तौ का भया, ज्यूँ टावर मोबाइल
सिगनल इतना वीक है, कछहुँ नहीं सुनाइल
गुरुवार, 24 मई 2012
टांग चबाते रहिये
(चित्र व दोहे: अनुराग शर्मा)
अंटी में नामा भरा अपनी सुनाते रहिये
माल जो मुफ्त मिले जम के उड़ाते रहिये
नज़्र चूके औ वो सामने पड़ जायें तौ
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये*
हूट करता हो जहाँ, बोर न समझें खुद को
टोके जग सारा तो भी अपनी बताते रहिये
जो कही खूब कही अब तो निकल ले शायर
रात भर शेर सुने सामयीन सताते रहिये
रूप गुण काम नहीं आते हैं इस दुनिया में
सौदागर फूस के हैं स्वर्ण छिपाते रहिये
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* एक प्रसिद्ध शायर की शब्दावली से साभार
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| जापान से स्वर्णजटित मिष्ठान्न |
माल जो मुफ्त मिले जम के उड़ाते रहिये
नज़्र चूके औ वो सामने पड़ जायें तौ
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये*
हूट करता हो जहाँ, बोर न समझें खुद को
टोके जग सारा तो भी अपनी बताते रहिये
जो कही खूब कही अब तो निकल ले शायर
रात भर शेर सुने सामयीन सताते रहिये
रूप गुण काम नहीं आते हैं इस दुनिया में
सौदागर फूस के हैं स्वर्ण छिपाते रहिये
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* एक प्रसिद्ध शायर की शब्दावली से साभार
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