फेसबुक पर केवल फालतू बकबक नहीं होती, त्रिकालजयी काव्य का भी सृजन होता है। उसकी व्याख्यायें और विमर्शादि भी घटित होते हैं। एक नमूना:
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चाहे जो कहिये, हिन्दी ब्लॉग जगत को देख कर तो यही लगता है कि कविताओं में महारत स्त्रियों को ही हासिल है। ऐसे ऐसे दिग्गज विद्वान साष्टांग टिप्पणियों और चर्चाओं में लगे होते हैं कि मुझे अपनी समझ पर भारी शंका होने लगती है। पिछले सप्ताह से तो मैं मान बैठा हूँ कि मुझे कविताओं की समझ ही नहीं है।