सोमवार, 15 नवंबर 2010

मतलब की दोस्ती

उल्लू के पट्ठे
हुए हैं इकट्ठे
बिठाने चले हैं
अपने ही भट्टे
उल्लू के पट्ठे...

4 टिप्पणियाँ:

deepak saini ने कहा…

वाह वाह क्या बात
व्यंग मे कितनी गहरी बात कह दी

गिरिजेश राव ने कहा…

अपने ही भट्टे ! :)

संघर्ष करो , हम तुम्हारे साथ हैं

मो सम कौन ? ने कहा…

देख के इकट्ठे,
उल्लू के पट्ठे
छूट रहे हैं
हंसी के ठट्ठे।

Anjana (Gudia) ने कहा…

:-))

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