मंगलवार, 21 मार्च 2017

३+२=५

कटे किनारे कई भँवर मझधार मिले।  
पानी में सब डूबते भँइसवार मिले॥ (गिरिजेश राव)

घर तो छूटा ही बस्ती भी छूट गई, 
लवमैरिज में ऐसे रिश्तेदार मिले। (अनुराग शर्मा)   

बना स्कीम भागा कन्हैया फाँसी से,  
खुदकुशी पोस्टपोन बाहर इनार मिले। (गिरिजेश राव) 

रहम की मांग रहा था भीख जिनसे वो, 
हाकिम सभी जालिम व अनुदार मिले। (अनुराग शर्मा) 

चलता रहा आँख मीचे ऊँट क्षितिज तक,  
साँझ खोली पहाड़ों के अन्हार मिले। (गिरिजेश राव)  

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

प्रेम गिलहरी दिल अखरोट


खस्ता शेर के सभी पाठकों को नववर्ष 2016 के आगमन पर हार्दिक मंगलकामनाएं!

युवा कवयित्री बाबुशा कोहली की पंक्ति "प्रेम गिलहरी दिल अखरोट" को विस्तार दिया अनुराग शर्मा ने

प्रेम गिलहरी दिल अखरोट
प्रेम लतीफा दिल लोटपोट

प्रेम इलेक्शन दिल का वोट
प्रेम गांधी तो दिल है नोट

प्रेम का कर्जा दिल प्रोनोट
प्रेम मथानी दिल को घोट

प्रेम TNT दिल विस्फोट
प्रेम के पत्थर दिल की चोट

प्रेम प्यास दिल सूखे होट
प्रेमी थीसिस दिल फुटनोट

~ चक्कू रामपुरी "अहिंसक"

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

फेसबुकी शायरी

खुदा करे के मुहब्बत में वो मुकाम आये 
ब्लॉककर्ता क्षमा मांगने हमारे धाम आये 
फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजे और तुरत ये पयाम पाये
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एक फेसबुकी पैरोडी
अश'आर मेरे यूं तो ब्लॉगियाने के लिए हैं 
 कुछ शेर फेसबुक पर टिपियाने के लिए हैं

फेसबुकी टिप्पणी पर दाग़ की याद
किस क़दर उनको फिराक़-ए-ग़ैर का अफसोस है 
हाथ मलते-मलते सब रंग-ए-हिना जाता रहा (~ दाग़) 
हल्के से कहने से अपनी बात ही हल्की हुई 
फ़ेसबुक की टिप्पणी, सारा मज़ा जाता रहा (~ राग)


अब अपनी चार लाइना चचा गालिब की ज़मीन पर
मैं मर गया तो क्या हुआ बनी रहे ये दुश्मनी 
मेरी कबर पे फातेहा, आ के कोई पढ़ाये क्यूँ। 


और अंत में प्रेमकाव्य
वो मिटियॉर सी गुज़रती हैं 
दिल ये तारे सा टूट जाता है 

 ~ चक्कू रामपुरी "अहिंसक"

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

चंद रामपुरी अश'आर चक्कू वाले

घूमते हैं लय के पहिये, मजबूत है तुक की धुरी
धुल गए सुर्मा बरेलवी, चलते हैं चक्कू रामपुरी

बात कितनी भी खरी हो धार ही बस खास है
कट्टे दुनाली किसे चहिए रामपुरी जो पास है

जिस तरें उस्तरे से हजामत है
चक्कू रामपुरी से,  क़यामत है

ओखल में सर देते हैं और मूसल देख के हँसते हैं 
ऐसे तुर्रमखाँ भी चक्कू रामपुरी को देखके डरते हैं

                            ~ चक्कू रामपुरी "अहिंसक"

शनिवार, 7 मार्च 2015

चक्कू रामपुरी के खस्ता शेर

चक्कू रामपुरी "अहिंसक"

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमती ने कुनबा जोड़ा
आग लगा के निकली वो क्यों तुमने मेरा माथा फोड़ा

कारज धीरे होत हैं मन काहे होत अधीर
मुँह तेरा जल जाए न, ठंडी कर ले खीर।

प्रकाशक ने भूखे को रस्ता दिया दिखाय
बर्तन भांडे बिकवा के पुस्तक दई छपाय

कागद कारे जल रहे बुद्धिमता की बास
गूढ कोई समझे नहीं, मूढ़ कवि हैं खास

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाए
कागज की छतरी बारिश से गल जाये

चलते कम हैं ज़्यादा लात घुमाते हैं
वैसे खुद को गिरती दीवार बताते हैं

और अंत में वर्तमान आतंकवादियों की प्रेरणा पर दुखद दृष्टिपात, मिर्ज़ा गालिब से क्षमायाचना सहित
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
कुछ हैवानों के लिए हूरों का ख्याल सच्चा है  

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं - 2

सनातन कालयात्री के ओरिजिनल शेर:

है अपने दिल का अकाउंट बहुत महफूज
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं!

पर आधारित "बस उनकी आँखें" का भाग एक आपने कुछ दिन पहले पढ़ा था। अब प्रस्तुत है भाग दो। शायरी अपने मेजर साब श्री गौतम राजरिशी जी की है

बड़े बड़ों के पर वे रोज़ कतरती हैं
मेरे कमेन्ट से मैडम लेकिन डरती हैं

एफबी पर तो रहती हैं दिन-रात डटी
चाइटिंग से जाने क्यूँ, हाय मुकरती हैं

उनके बस इक हेलो पर दीवानों की
सौ दो सौ स्माइलियाँ आहें भरती हैं

अपने दिल की आईडी तो है सेफ मगर
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं

(गौतम राजरिशी)

रविवार, 29 दिसंबर 2013

बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं

"खस्ता शेर" के ढाबे पे आके सनातन कालयात्री जी कहने लगे कि हमारे शेर को तल के खस्ता कर दो। हमने कहा, ज़रा दिखाये तो उन्ने  दिखाया। हम तो शेर देखते ही समझ गए कि अंगीठी के बस का न है ये शेर, इसके लिए तो भट्टी चढ़ानी पड़ेगी। हमने कहा कि हम अंदर से निकाल के एक गजल अभी-हाल पका देते हैं, खस्ता और कुरकुरी। पहले तो उन्ने थोड़ी नानुकर की लेकिन जब लगा कि भट्टी चढ़ाने में काफी देर लग जाएगी तो मान गए। तो ये तो था उनका ओरिजिनल शेर:
   
है अपने दिल का अकाउंट बहुत महफूज
बस उनकी आँखें ही लॉगिन करती हैं!

और ये है फाइनल खस्ता गजल। अच्छी तरह चबा-चबा के पढ़िये:  

दिल का है मेरे खाता, चौकस रखवाली है
छूट उनको मिली है हर द्वार की ताली है॥

वे नज़रें मिलाते हैं, सीटी हो बजी जैसे
रेले-दिल छूटी है, टेसन हुआ खाली है॥

ख्वाबों में रहा करते, आँखों में बसे हैं वे
हर दिन है दशहरा औ' हर रात दिवाली है॥

ये आँख नहीं खुलती, मैं कैसे नशे में हूँ
भीगे हैं तेरे गेसू, मदिरा की प्याली है॥

दैवी है वो मुखड़ा, सूरज सा दमकता है
ध्रुवपद हुए जाते वे, जो गाते कव्वाली हैं॥

दिल जान हुए तेरे, अब मेरा नहीं कोई
अनुरागी हो "बैरागी", ये रीत निराली है॥

(अनुराग शर्मा)