रविवार, 21 नवंबर 2010

फत्ते की फालतू

तेरे गुनाह-ए-इश्क़ में सनम मैं तार तार हुआ
चप्पलें चलीं, घिसीं फिर चिपक बेड़ियाँ हुईं
रूमाल में सेंट सेंटी हुआ जब हथकड़ी अदा हुई
बह चले पनारे नाक से आँख कीच कचा हुई
ग़म नहीं फत्ते को कि तुम पोंछने नहीं आई।

गम इसका रहेगा हमेशा कि जब  गिरफ्तार हुआ
जार जार रोया चीख से नींद सबकी हराम किया
लुटा पिटा बिलबिलाता भूख से चिल्लाता रहा
कभी ईर कभी वीर संग रेस्ट्रा कबाब खाती रही
पर दिल के दरवज्जे तुम टिफिन तक न ले आई।

11 टिप्पणियाँ:

ana ने कहा…

behatrin.........maza aa gaya

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

हाय रे! यह दर्द भरा अफसाना...

deepak saini ने कहा…

एक सच्चे आशिक का यही हाल होता है

बहुत खूब

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

bahut sundar ! adbhud !

गंगेश राव ने कहा…

हुए हम जिनके लिए बर्बाद
वो चाहें हमको करें न याद.....

अफसाना उनकी याद में...............!

anshumala ने कहा…

bechara aashik bahut bura huaa .

Akhtar Khan Akela ने कहा…

bhaayi bdaa zaalim mehbub he tumhaara or bda kleja aashiq he aapka . akhtar khan akela kota rajsthan

मो सम कौन ? ने कहा…

फ़त्तू का सनेसा, फ़त्ते के नाम:

और कल्ले मोहब्बत, हम तो पेले से ई समझा रिये थे कि निकम्मा हो जायेगा इसक, विसक, पिरेम, पियार में। अब थानेदार करवायेगा तुझसे इकबाले-जुर्म।

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA ने कहा…

संजय भाई, जमानतीय लाओ - फत्तू गिरफ्तार हो गया है.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

eeee fate gai knhaha ............. jo itna fate-fate huye ja rahen hain

Anjana (Gudia) ने कहा…

ek dam mast! :-)

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