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बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

इशक मस्ताना

सँभल सँभल जइयो वीर सँभल सँभल जइयो
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

इशक गली में आगे है बड़का पागलखाना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

रंगे हाथ पकडे न जइहो, पहिर लियो दस्ताना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

लैला है या है मजनू, मरजीना या मरजाना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

अपना कुर्ता फाड के घूमें लोग कहें दीवाना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

दुश्मन से न डरते यार हमका मार गया याराना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

इशक के हाथ शहीद हुए हम इशक नहीं दुहराना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

बेदर्दी को दे डाला दिल चक्की में पिसवाना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

फत्ते प्यार करें उससे जो प्रेम से है अन्जाना
हम इशक मस्ताना फत्ते हम इशक मस्ताना।

(परम आदरणीय संत कबीर से क्षमा याचना सहित)

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

महाकवि फत्ते के बेढंगे दोहे

बड़े बड़ाई ना तजें, मन में रहे फितूर
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।

चलता राही देख के, कउवा रहा हर्षाय
कपड़ों पर बीट की, जोरू पीटे दौड़ाय।

फत्ते सुमिरन ना करे दुख पाए दिन रात
जब भी गैस खत्म हो, खाये बासी भात।

बैठी चिड़िया डार पर, गाए अजब सा राग
सारे बटन नोच गई, दर्जी तक पहुँचो भाग।

फत्ते माला ना जपो, जीवे तुम्हरी हीर
रटते रटते चुप हुई, अंगुली गठिया पीर।
 
  

रविवार, 21 नवंबर 2010

फत्ते की फालतू

तेरे गुनाह-ए-इश्क़ में सनम मैं तार तार हुआ
चप्पलें चलीं, घिसीं फिर चिपक बेड़ियाँ हुईं
रूमाल में सेंट सेंटी हुआ जब हथकड़ी अदा हुई
बह चले पनारे नाक से आँख कीच कचा हुई
ग़म नहीं फत्ते को कि तुम पोंछने नहीं आई।

गम इसका रहेगा हमेशा कि जब  गिरफ्तार हुआ
जार जार रोया चीख से नींद सबकी हराम किया
लुटा पिटा बिलबिलाता भूख से चिल्लाता रहा
कभी ईर कभी वीर संग रेस्ट्रा कबाब खाती रही
पर दिल के दरवज्जे तुम टिफिन तक न ले आई।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

फत्ते का चौथा

फत्तू की करवाचौथ तो आपने देख ली मो सम कौन पर अब समय है फत्ते का चौथा देखने की। देखते हैं भाई कित हान्डै सै:

साल भर इतराकर
नाकों चने चबवाकर
फत्ते की घराळी ने
चौथे के दिन छूकर
पंजे धोक लगाई
आशीर्वाद भी मांगा
तो बेचारा नूँ बोल्या
खुश रहो, आबाद रहो
सदा ज़िन्दाबाद रहो
कराची या फैसलाबाद रहो
मन्नै बख्शो, आज़ाद रहो।

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

ईर, वीर, फत्ते का झगड़ा

ईर कहेन वीर से चलो झगड़ा कर आईं ,
वीर कहेन फत्ते से चलो झगड़ा कर आईं, 
फत्ते पूछे - केसे कर आईं? काहें कर आईं?

ईर दिए एक लाफा,
वीर दिए दुइ लाफा, 
फत्ते बस गाल सहलाते रहे। 

झगड़ा गड़ा गया। 

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

ईर, वीर, फत्ते के परेमपत्तर

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एक रहेन ईर, एक रहेन वीर, एक रहेन फत्ते।

ईर कहेन वीर से - चलो परेमपत्तर  लिखा जाई 
वीर कहेन फत्ते से - चलो परेमपत्तर  लिखा जाई 
ईर लिखे एक ठो 
वीर लिखे दू ठो 
फत्ते लिखे पूरी रमयनी। 

ईर कहेन वीर से - चलो परेमपत्तर दिया जाई 
वीर कहेन फत्ते से - चलो परेमपत्तर दिया जाई 
ईर दिएन अपनी वाली को 
वीर भी दिएन अपनी वाली को 
फत्ते की कोई थी ही नहीं! 
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