शनिवार, 21 जनवरी 2012

रसोई में कुत्ता आया

भूखा कुत्ता
फिल्मों के कई गीतों में 'खस्ता' टाइप के बोल सुनाई दे जाते हैं जैसे किसी एक गाने में यह पंक्ति है - तम्बाकू नहीं है कैसे कटेगी सारी रात, बुढ़िया रोये..। प्रश्न यह है कि ऐसा साहित्यिक कृतियों में भी होता होगा? उत्तर है - हाँ।
अपनी प्रसिद्ध रचना 'वेटिंग फ़ॉर गॉडो' में सैम्युअल बैकिट एक खस्ता रचना से हमें रूबरू कराते हैं। अनुवाद है - कृष्ण बलदेव वैद का।
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रसोई में कुत्ता आया 
चुरायी सूखी रोटी।
बावर्ची ने कलछ उठाया
और कर दी बोटी बोटी!
फिर सारे कुत्ते आये
रसोई में दौड़े दौड़े 
और क़बर खोद कर उसकी
लिख दिया उसी पर यह - 
'आने वाली कुत्ती नसलों के लिये'। 
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किसी भी स्पष्टीकरण के लिये आप सैम्युअल बैकिट या कृष्ण बलदेव वैद से सम्पर्क कर सकते हैं। नेट आप के पास है- पता सता खुद ढूँढ़ लीजिये। 
हाँ, इस रचना में परिवर्द्धन के लिये आप की पंक्तियाँ आमंत्रित हैं। 


4 टिप्पणियाँ:

Smart Indian ने कहा…

क्या होता इक रोटी उसको भी खाने देते
क्यों मारी पेट पे लात उसे बस जाने देते

स्वामिभक्ति का रूप सदा रक्षा ही करता
काम तुम्हारे ही आता गर दो दाने देते

दीपक बाबा ने कहा…

वाह

गंगेश राव ने कहा…

बहुत अन्याय हुआ बेचारे कुत्ते के साथ

Rajesh Kumari ने कहा…

humari jindagi me na jaane kitne kirdar yese aate hain chahe vo janvar hi kyun na ho jispar likhne ke liye kalam apne aap chal padta hai baba nagarjun ki kavitayen bhi iski achchi misaal hai.mere blog par ek meri likhi kavita gareebi ka sooraj jaroor padhiye usme bhi kutte ka jikra milega.aap mere blog par aaye mujhe achcha laga.

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