सोमवार, 30 जनवरी 2012

है दुनिया इन्हीं की ज़माना इन्हीं का

(अनुराग शर्मा)

कभी ये भी मालामाल थे
कभी इनके सर पे भी बाल थे
इन्हें आज की न मिसाल दो
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

ये मुँह तो शादी से बन्द है
पहले ये बहुत ही वाचाल थे
अब अपने आप ही क्या कहैं
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

लाजवाब और बेसवाल थे
ये ग़ज़लची चच्चा कव्वाल थे
बस इन्हींकी तूती थी बोलती
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

रिश्वत मैया के प्यारे लाल थे
पड़े काम तो करते हलाल थे
बख्शीश बिन न हिले कभी
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

7 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ये मुँह तो शादी से बन्द है
पहले ये बहुत ही वाचाल थे
अब अपने आप ही क्या कहैं
कभी ये भी बन्दा कमाल थे

:):) बढ़िया प्रस्तुति

सुज्ञ ने कहा…

vaah!! kamaal kaa bandaa!!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - थिस इज़ बेटर देन ओरिजिनल जी... - ब्लॉग बुलेटिन

SKT ने कहा…

कुछ ऐसा ही एक खस्ता शेर हमारे एक मित्र ने बनाया था:
करा दो इसकी भी शादी
जालिम बड़े चैन से सोता है

मनीष सिंह निराला ने कहा…

लाजबाब प्रस्तुति !
बहुत अच्च्छा लगा !
आभार!

dheerendra ने कहा…

वाह!!!!!भावपूर्ण बहुत अच्छी प्रस्तुति ..सुंदर रचना

MY NEW POST ...सम्बोधन...

vidya ने कहा…

:-))
अच्छी प्रस्तुति...

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