गुरुवार, 24 मई 2012

टांग चबाते रहिये

(चित्र व दोहे: अनुराग शर्मा)


जापान से स्वर्णजटित मिष्ठान्न
अंटी में नामा भरा अपनी सुनाते रहिये
माल जो मुफ्त मिले जम के उड़ाते रहिये

नज़्र चूके औ वो सामने पड़ जायें तौ
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये*

हूट करता हो जहाँ, बोर न समझें खुद को
टोके जग सारा तो भी अपनी बताते रहिये

जो कही खूब कही अब तो निकल ले शायर
रात भर शेर सुने सामयीन सताते रहिये

रूप गुण काम नहीं आते हैं इस दुनिया में
सौदागर फूस के हैं स्वर्ण छिपाते रहिये
-----------
* एक प्रसिद्ध शायर की शब्दावली से साभार

9 टिप्पणियाँ:

सुज्ञ ने कहा…

रूप गुण काम नहीं आते हैं इस दुनिया में
सौदागर घास के हैं स्वर्ण छिपाकर रहिये

सटीक!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रूप गुण काम नहीं आते हैं इस दुनिया में
सौदागर घास के हैं स्वर्ण छिपाकर रहिये

बढ़िया व्यंग .... अच्छी गजल

वाणी गीत ने कहा…

वाह !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत खूब महाराज ... लगे रहिए ...



इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - माँ की सलाह याद रखना या फिर यह ब्लॉग बुलेटिन पढ़ लेना

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

इस जापानी मिष्ठान्न से मेरा क्या होगा? :)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

@ शिवम, शुक्रिया!
@ संजय, मिठाई बहुत हैं, दिसम्बर में मन भर के खाना।

आशा जोगळेकर ने कहा…

हूट करता हो जहाँ बोर न समझें खुद को
टोके जग सारा तो भी अपनी बताते रहिये ।

क्या बात है ।

Kailash Sharma ने कहा…

नज़्र चूके औ वो सामने पड़ जायें तौ
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिये*

बहुत सुन्दर और सटीक रचना....

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