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गुरुवार, 30 जनवरी 2020

बिल्लियाँ कब शेर बनके छिप सकेंगी

खुद दुखी हो के पछाड़ें खा रहे हैं
सब गढ़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं।

हाथ में डेली नमक की लग गई है
घाव दिल के सब उघाड़े जा रहे हैं।

बिल्लियाँ हैं शेर की मौसी सदा से
मांद सिंहों के उजाड़े जा रहे हैं।

शेर सब प्यारे खुदा को हो गए हैं  
दम लगा चूहे दहाड़े जा रहे हैं।

दाख़िला ले-देके जिनका हो गया था
ठोंक कर तालें अखाड़े आ रहे हैं।

भेड़िये कब भेड़ बनके छिप सकेंगे
देखें कबतक वे सिंघाड़े खा रहे हैं।

शायरी हमसे कही जाती नहीं अब
कोरे ही सफ़हात फ़ाड़े जा रहे हैं॥

~ चक्कू रामपुरी "अहिंसक"


बुधवार, 26 दिसंबर 2018

चश्मे बद्दूर (उर्फ़ दीदारे यार)

- उस्ताद चक्कू रामपुरी 'अहिंसक'


काश चश्मा तुम्हारा हिल जाये
और ये आँख हम से मिल जाये

प्यार में है बहुत कुछ कहने को
पास आने पे मुख क्यों सिल जाये

एक पल की सौगात है लेकिन
उम्र भर को हमारा दिल जाये

इक नज़र जो पड़े मुहब्बत से
दिल हमारा पल में खिल जाये

दिल नहीं खोलते किसी से अब
घाव फिर से कहीं न  छिल जाये