सोमवार, 18 अप्रैल 2011

16-11...मात्रायें ;)

जोर जोर से पीटो भाया, दागी हमरी पीठ
देख तमाशा जूते खायें, जबरी हमरी दीठ।

लोटा हमरा बौत पवित्तर, मैली रहती जींस
सड़क किनारे निपटें हरदम, हम हैं बड़के ढीठ।

घर में बसते देव सभत्तर, आँगन में हैं पीर
सड़क किनारे कूड़ा फेंकें, पूजा हमसे सीख।

बाइक बैठें बीड़ी फूँकें, चौराहे के मीत
पप्पा कहते करिअर महँगा, गुटका सस्ती पीक।
  

8 टिप्पणियाँ:

ana ने कहा…

mazedar....bahut achchha laga padhkar

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

असलियत का चित्रण है फिर भी चचा की बात याद आ गयी:
हरेक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है
तुम्हीं कहो के यह अन्दाज़े-गुफ्तगू क्या है?

Vishal ने कहा…

Wah Wah!!
Khas taur se Yeh:
घर में बसते देव सभत्तर, आँगन में हैं पीर
सड़क किनारे कूड़ा फेंकें, पूजा हमसे सीख।

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

चचा की रूह काबिज हो गई दीखे है जो बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल हो रिया है आपके आगे।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

ग़ज़ब है ग़ज़ब.

V!Vs ने कहा…

16-11 atraye mtlb.......mst h

RAJ SINH ने कहा…

mast hai bhayi mast .khasta aur must bhee !

shilpa mehta ने कहा…

बात करन में हम हैं आगे , काज करन में पीछे |
दुकान ऊंची होत है हमरी , पकवान होवें फीके |

नेता कसम खाय मिट्टी की , मिट्टी देश पे फेरें
राष्ट्र नाम पे मिट्टी मलते , अपनी मिट्टी बेचें |

आँख में नहीं पानी इनकी , देश है पानी पानी ,
स्विस खातों में चमके पानी, जनता भरती पानी |

एक टिप्पणी भेजें

आते जाओ, मुस्कराते जाओ!