गुरुवार, 17 मार्च 2011

सभ्य फगुनाहट

आज थोड़ी गम्भीर शृंगारिकता - स्वाद बदलने को :) आशा है आप लोग पसन्द करेंगे।


(1) 
फागुन ने चूमा
धरती को -
होठ सलवट 
भरा रास रस। 
भिनसारे पवन 
पी गया चुपके से -
.. खुलने लगे
घरों के पिछ्ले द्वार । 
(2) 
फागुन की सिहरन 
छ्न्दबद्ध कर दूँ !
कैसे ?
क्षीण कटि - 
गढ़न जो लचकी ..
कलम रुक गई।
(3) 
तूलिका उठाई - 
कागद कोरे
पूनम फेर दूँ।   
अंगुलियाँ घूमीं 
उतरी सद्यस्नाता -
बेबस फागुन के आगे। 

9 टिप्पणियाँ:

Deepak Saini ने कहा…

तीनो क्षणिकाये बेहतरीन है
होली की शुभकामनाये

Dr Xitija Singh ने कहा…

आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

Smart Indian ने कहा…

सभी पाठकों और संरक्षकों को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

प्रशंसनीय लेखन के लिए बधाई।
========================
निखरती रहे वह सतत काव्य-धारा।
जिसे आपने कागजों पर उतारा॥
========================
आपकी लेखनी में बड़ा दम है।
लेखनी क्या मानो एटमबम है॥
===========================
होली मुबारक़ हो। सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
==========================

ज्योति सिंह ने कहा…

sabhi khsanikaaye bahut hi sundar .rang parv ki badhai .

Unknown ने कहा…

फागुन ने चूमा
धरती को -
होठ सलवट
भरा रास रस।


jai baba banaras.......

hamarivani ने कहा…

nice

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" ने कहा…

sunder rachna.....

Anamikaghatak ने कहा…

wah ati sundar

एक टिप्पणी भेजें

आते जाओ, मुस्कराते जाओ!