सोमवार, 30 जुलाई 2012

हम क्या हैं?

खिड़की पर ओर्किड
(चित्र व शब्द: अनुराग शर्मा)

कभी काग़ज़ी बादाम हैं
कभी ये टपके आम हैं
तारीफ़ अपनी क्या करें
जो आदमी गुमनाम हैं

कभी ये बिगड़ा काम हैं
कभी छलकता जाम हैं
कैसे मियाँ  मिट्ठू बनें
जो आदमी बदनाम हैं

रक़ीबों का पयाम हैं
सुबह न गुज़री शाम हैं
अपने मुँह से क्या कहें
जो हर तरफ़ नाकाम हैं

7 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हम क्या हैं ? ज़रा सोचते हैं ..... विचार करने वाली पोस्ट

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

अपने बारे में क्या कहें
जो हर तरफ़ नाकाम हैं....are waah ....mere man ki bat...

Aditipoonam ने कहा…

चिंतन करने के लिए मजबूर करती रचना -हम क्या हैं

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

क्या कहने, बहुत सुंदर

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

मूड-मूड की बात है सब !

bhola.krishna@gmail .com ने कहा…

ना सुबह है ना शाम है ना छाँह है ना घाम है
अनुराग जी निज देश का हर नागरिक ही आम हैं

कोई करप्शन में रमा नित खेलता है 'क्रोर' से
वंचित है कोई नून मिश्रित भात के भी कौर से

यह आम है,वह आम है,दुनिया मि सब कुछ आम है
नाहक हि भारत का बिचारा आम जन बदनाम है

व्ही एन श्रीवास्तव "भोला कृष्णा"

Amrita Tanmay ने कहा…

वाह!

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