मंगलवार, 15 मार्च 2011

भंग की तरंग में कुछ पंक्तियाँ


कुछ गाने को दिल करता है, सुना लूँ?
तालियाँ बजाओगे या रामपुरी निकालूँ?

दिल के बहाने कहीं ले न उडें चुप के
ज़रा सा रुक जाओ, बटुआ छिपा लूँ

जिनकी होनी थी उन सबकी हो ली
मस्ती में मैं भी तो रंग में नहा लूँ

लाज की लाली से लाल हो रहे हैं जो
उन गालों से थोडा सा रंग चुरा लूँ?

बुरा न मानो होली है!

3 टिप्पणियाँ:

नीरज बसलियाल ने कहा…

होली है !!!

Deepak Saini ने कहा…

वाह वाह क्या बात है
रामपुरी निकालने की जरूरत नही है, हम तालिया बजा रहे है
होली की शुभकामनाये

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

काहे डराते हैं भैया, बजा रहे हैं तालियँ।

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आते जाओ, मुस्कराते जाओ!